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36. क्या प्रभु को भी जप में आनंद आता है ?

भक्ति का इतना सामर्थ्य है कि प्रभु भी भक्‍त का नाम जपते हैं । जैसे भक्त को प्रभु का नाम जपने में परमानंद आता है वैसे ही प्रभु भी अपने प्राण प्रिय भक्तों का नाम जपते हैं और परम आनंद मानते हैं । नाम जप अंश (जीव) और अंशी (प्रभु) दोनों को आनंद प्रदान करता है ।

35. नाम से स्मरण तक की यात्रा क्या है ?

स्मरण भक्ति का सही अर्थ है कि नाम लिए बिना भी प्रभु स्मरण हो जाए । श्री प्रह्लादजी और श्रीगोपीजन बिना नाम लिए प्रभु का निरंतर स्मरण करते रहते थे । नाम हमें आरंभ से ही प्रभु का स्मरण करने का अभ्यास करता है । फिर परिपक्व अवस्था में नाम के बिना भी प्रभु का लगातार स्मरण चलता रहता है ।  

34. प्रभु के अनेक नाम क्यों हैं ?

नाम अनेक पर नामी (प्रभु) तो एक ही हैं । एक नामी (प्रभु) के अनंत नाम हैं । प्रभु जैसे-जैसे श्रीलीला करते हैं उनके नाम श्रीलीला अनुसार पड़ते जाते हैं । पर प्रभु का हर नाम समान है और समान फल दे ने वाला है । प्रभु के हर नाम में हमारा मंगल और कल्याण करने की समान शक्ति है ।

33. नाम जापक की सबसे ऊँची अवस्था क्या है ?

प्रभु स्मरण के लिए नाम है पर एक अवस्था ऐसी आनी चाहिए जब स्मरण को नाम की आवश्यकता ही नहीं रहे और प्रभु का स्मरण जीवन में निरंतर चलता रहे । यह नाम जापक की सबसे ऊँची अवस्था है क्योंकि नाम ने वह कर दिया जो उसे करना था ।

32. नाम जप से प्रभु का स्मरण कैसे होता है ?

जैसे एक माँ को विदेश पढ़ने गए हुए उसके बेटे का नाम लिए बिना उसकी याद आती है ऐसे ही लगातार प्रभु का स्मरण नाम से होता जाएगा तो एक अवस्था ऐसी आएगी कि प्रभु का नाम लिए बिना भी प्रभु की याद हमें जीवन में आती रहेगी और प्रभु का स्मरण जीवन में निरंतर होता रहेगा । ये नाम जप की सच्ची उपलब्धि होती है ।

31. नाम स्मरण क्या करता है ?

नाम स्मरण में नाम के आधार से नामी (प्रभु) का स्मरण होता है । प्रभु का स्मरण होते ही हमारे संचित पाप कटते हैं और हमें परमानंद की अनुभूति होती है । प्रभु का स्मरण होने पर हमा रे इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है । प्रभु का नाम जगत में भी हमारा मंगल करता है और जगत के बाद भी हमारा मंगल करता है ।

30. चौबीस घंटे प्रभु का नाम जप कैसे हो सकता है ?

चौबीस घंटे प्रभु का नाम जप संभव है पर चौबीस घंटे पूजा , भजन , कीर्तन , श्रवण नहीं हो सकता । पर चौबीस घंटे प्रभु का जप से स्मरण तो जरूर हो सकता है । इसलिए चौबीस घंटे प्रभु का जप से स्मरण जीवन में होना चाहिए । प्रभु का जप से स्मरण भक्ति का एक बहुत श्रेष्ठ अंग है । श्रीगोपीजन ने निरंतर प्रभु नाम लेकर स्मरण किया और इसलिए वे प्रभु को अत्यंत प्रिय हो गईं ।

29. प्रभु का नाम कैसे हमारी जुबां पर चलाना चाहिए ?

अभ्यास से और प्रभु प्रेम के कारण प्रभु का नाम अपनी जुबां पर सदैव चलते रहना चाहिए । दो ही शर्त है पहला, अभ्यास से और दूसरा, प्रभु के लिए प्रेम के कारण निरंतर प्रभु का नाम हमारी जुबां पर चलते रहना चाहिए । अगर अभ्यास का दृढ़ निश्चय है और प्रभु के लिए पूर्ण प्रेम है तो ऐसा होना संभव है ।     

28. क्या प्रभु भी अपने भक्तों का नाम लेते है ?

प्रभु नींद में भी श्रीगोपीजन का नाम लेते थे । यह बात भगवती रुक्मिणी माता ने देवर्षि प्रभु श्री नारदजी को बताई थी । प्रभु प्रेम की इतनी ऊँ‍‍ची अवस्था को श्री गोपीजन प्राप्त हो गई थी कि प्रभु भी उनका स्मरण करके उनका नाम लेते थे । जैसे साधक को प्रभु का नाम लेने में आनंद आता है वैसे ही प्रभु को भी अपने प्रिय भक्तों का नाम लेने में परम आनंद आता है ।

27. श्रीगोपीजन का नाम जप कैसा था ?

श्रीगोपीजन के मन में प्रभु रमे हुए थे । अंतःकरण में वे सदैव प्रभु को ही निहारती थीं । उनकी जिह्वा पर भी सदैव प्रभु का ही नाम होता था । वे तो प्रभु का नाम लेती रहती थीं । वे जो दूध-दही बेचने जाती थीं तो भी यह नहीं कहती थी कि दूध-दही ले लो, वे कहती थी कि कान्हा ले लो । नाम में वे इतनी आ सक्त हो गईं थीं ।  

26. क्या जीवन की हर धड़कन पर नाम जप हो सकता है ?

अपने जीवन की हर धड़कन पर प्रभु का नाम जप हो जाना चाहिए । ऐसा संभव है कि नाम हाथों की माला की जगह श्‍वासों की माला पर होने लग जाए पर यह परिपक्व अवस्था है । हमें अभ्यास और प्रयास करते हुए ऐसी अवस्था तक पहुँचना चाहिए ।

25. प्रभु के लिए सबसे सरल साधन क्या है ?

प्रभु का नाम उच्चारण बड़ा सरल साधन है । नाम जप से अधिक सरल साधन कुछ भी नहीं है इसलिए सभी संतों ने इसका महत्व बतलाया है । कलियुग में नाम जप प्रधान साधन है और इसका महत्व सबसे ज्यादा है । इसलिए सभी शास्त्रों, संतों ने नाम जप की महिमा गाई है ।

24. क्या प्रभु का नाम गिनना हमारा काम है ?

प्रभु का नाम लेना हमारा काम और उस नाम को गिनना प्रभु के पार्षदों का काम । पर हम यह गलती कर बैठते हैं कि हम नाम लेकर गिनने लगते हैं कि हमने कितने नाम लिए । हमें तो बस श्‍वासों की माला पर प्रभु का मंगल नाम लेते रहना है । प्रभु हम पर कृपा गिनकर नहीं करते तो हमें भी ऐसा नहीं करना चाहिए । अभ्यास के लिए शुरु में नाम माला की गिनती पर करना प्रारंभ करना चाहिए पर एक अवस्था ऐसी आनी चाहिए जब गिनती छूट जाए और नाम श्‍वासों पर चलने लगे ।  

23. प्रभु नाम जप से क्या अनुभूति होनी चाहिए ?

प्रभु के नाम उच्चारण करने से हमारे हृदय में प्रभु के लिए प्रेम और आनंद की लहर उठनी चाहिए । हमें पूर्ण परमानंद प्रभु की अनुभूति होनी चाहिए । प्रभु नाम से मीठा कुछ भी नहीं है जिस कारण प्रभु का नाम हमें प्रभु प्रेम और परमानंद के सागर में डुबो देता है ।

22. प्रभु नाम जप का क्या फल है ?

प्रभु के नाम के उच्चारण का फल अद्वितीय है । हमारे संचित पाप कटते हैं, मन में शांति और परमानंद की अनुभूति होती है और हमारा इहलोक और परलोक में मंगल और कल्याण सुनिश्चित हो जाता है । प्रभु का नाम एक कवच की तरह सदा हमारी रक्षा करता है ।

21. नाम जप कैसे करना चाहिए ?

प्रभु का नाम जपते समय हमारा मन जिह्वा के साथ जुड़ जाए , तात्पर्य यह है कि मन का अपनी सभी इंद्रियों के साथ नाम में जुड़ना सबसे जरूरी है तभी हमारा नाम जप साकार होगा । नाम जप ते समय अपना चंचल मन सर्वप्रथम जप में लगाना चाहिए ।

20. प्रभु नाम जप कब फलीभूत होता है ?

अगर पूर्ण भावना से प्रभु का नाम जप होता है तो वह निश्चित ही फलीभूत होता है । नाम जप के पीछे प्रभु के लिए भाव का मुख्य महत्व है । वैसे बिना भाव से लिया नाम भी हमारा मंगल ही करेगा तो फिर भाव से लिया नाम क्या नहीं कर सकता ।

19. कौन-सी आदत हमारा मंगल करेगी ?

प्रभु का निरंतर नाम लेने की आदत जीवन में लग जानी चाहिए । प्रभु नाम लिए बिना रहना ही असंभव हो जाना चाहिए । ये ही वह आदत है जो हमारा परम मंगल करेगी और हमें भवसागर से तार कर हमारा परलोक भी संवार देगी ।

18. क्या प्रभु की सारी शक्तियां नाम में समाहित हैं ?

प्रभु ने अपनी समस्त शक्तियों को अपने नाम में समाहित करके रखा है । इसलिए जो सामर्थ्‍य प्रभु का है वही सामर्थ्‍य प्रभु के नाम का है । जैसे प्रभु के लिए कुछ भी करना असंभव नहीं है वैसे ही प्रभु के नाम के लिए भी कुछ भी करना असंभव नहीं है ।

17. नाम ने क्या प्रभु से भी ज्यादा लोगों का मंगल किया है ?

जब प्रभु अवतार लेकर आते हैं तो अपने अवतार काल में जो भी प्रभु के संपर्क में आता है प्रभु उसे तार देते हैं पर प्रभु के स्वधाम वापस जाने के बाद यही काम प्रभु का नाम लगातार करता रहता है । न जाने प्रत्यक्ष प्रभु से भी कितने ज्यादा लोगों को प्रभु के नाम ने तारा है । प्रभु के नाम ने कि तनों को तारा है उसकी कोई गिनती ही नहीं कर सकता ।